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Rameshwar Temple - Tamilnadu

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 रामेश्वरम धाम - तमिलनाडु  चार धामों में से एक रामेश्वर धाम भारत में स्थित तमिलनाडु ( दक्षिण ) का एक प्रमुख धाम है । हिंदुओं का यह प्रमुख तीर्थ स्थल हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार द्वीप है । मद्रास राज्य के रामनाथपुरम जिले में भारत के दक्षिणी सीमा के अंतिम स्थल पर यह रामेश्वर द्वीप है । यह द्वीप पुराणों में गंधमादन पर्वत के नाम से वर्णित है । श्री राम के नाम पर इसका नाम रामेश्वर हुआ क्योंकि भगवान श्री राम ने ही इसे यहां स्थापित किया था । रामेश्वर की स्थापना की कथा कुछ इस प्रकार है - माता सीता की खोज करते हुए श्री रामचंद्र जी सुग्रीव की सेना को साथ लेकर यहां आए । रावण पर आक्रमण करने के लिए समुद्र को पार करना अति आवश्यक था , तब प्रभु श्री राम ने सागर से मार्ग मांगा परंतु सागर ने मार्ग नहीं दिया । श्री राम को क्रोध आया उन्होंने अग्निबाण के द्वारा सागर को सुखा देने की बात सोची , तभी समुद्र देव ने एक ब्राह्मण के रूप में प्रकट होकर उनसे क्षमा मांगी और एक पुल निर्माण करने की बात कही । तत्पश्चात विश्वकर्मा के पुत्र नल और नील जो महान शिल्पी थ...

Haridwar - Uttrakhand

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 हरिद्वार - उत्तराखंड  हरिद्वार भारत का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है । यह उत्तराखंड के हरिद्वार जिले का एक प्रमुख सनातनी तीर्थ है। सात पूरियों में से मायापुरी हरिद्वार के विस्तार के भीतर आती है । प्रति 12वें वर्ष जब सूर्य और चंद्र मेष में और बृहस्पति कुंभ राशि में स्थित होते हैं , तब यहां कुंभ का मेला लगता है , उसके छठे वर्ष अर्धकुंभी होती है । हरिद्वार के कई नाम है हरिद्वार , हरिद्वार , गंगा द्वार , कुशावर्त , मायापुरी , कनखल , ज्वालापुर और भीमगोडा ।  पद्म पुराण के अनुसार हरिद्वार को स्वर्ग का द्वार कहा जाता है। यहां जो मनुष्य एकाग्र होकर कोटि तीर्थ में स्नान करता है , उसे पुंडरीक यज्ञ का फल मिलता है । वह अपने कल का उद्धार करता है । यहां एक रात निवास करने से सहस्त्र गो-दान का फल मिलता है सप्तगंगा , त्रिगंगा और शुक्रवर्त में विधिपूर्वक देवर्षिपितृतर्पण करने वाला पुण्यलोक में प्रतिष्ठित होता है । ऐसा करने वाला अश्वमेध यज्ञ का फल पता है और स्वर्ग का स्वामी होता है । पुराणों में लिखा है कि आदिकाल में ब्रह्मा जी ने विराट यज्ञ का अनुष्ठान किया था । वह अनुष्ठान उन्होंने हरिद्वार मे...

Dwarkadhish Temple - Gujarat

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 द्वारकापूरी ( सौराष्ट्र ) गुजरात भगवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारका की गणना सात पीढ़ियों मे भी कि जाती है। पुराणों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरकाल मे शांतिपूर्वक एकांत क्षेत्र मे रहने के उद्देश्य से सौराष्ट्र ( गुजरात ) के समुद्र तट पर द्वारकापुरी नामक नगरी बसाई। वहां उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया । उन्होंने भगवान विश्वकर्मा द्वारा समुद्र में ( कुशस्थली द्वीप में ) द्वारकापुरी बनवाई और मथुरा से सभी यादवों को यहां ले आए । श्री कृष्ण के लीला संवरण के पश्चात द्वारका समुद्र में समा गई, केवल श्री कृष्ण का निजी भवन नहीं डूबा । वज्रनाथ ने यही पर श्रीरणछोड़राय के मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की । यहां मर्दादित सागर भगवान श्री कृष्ण के चरणों को धोया करता था । यही कंचन और रत्नजड़ित मंदिर की सीढ़ियों पर खड़े होकर दीन - हीन सुदामा ने मित्रता कि दुहाई दी थी । अपने मित्र सुदामा का नाम सुनते ही श्री कृष्ण नंगे पैर उठकर उनसे मिलने को दौड़े थे । यही वह स्थान है जहां वियोगिनी मीरा ने अपने प्रियतम के चरणों पर अपने प्राण न्योछावर किए थे । सतयुग में महाराज रेवत ने समुद्र के मध्य की भूमि पर कुश बि...

Badrinath Dham

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 बद्रीनाथ धाम  हमारे देश मे चार तीर्थ स्थानों को अत्यंत पवित्र एवं महत्वपूर्ण माना जाता है ।  1- बद्रीनाथ  2- द्वारका  3- जगन्नाथ  4- रामेश्वरम इन चारों तीर्थ स्थानों में बद्रीनाथ सबसे महत्वपूर्ण है । कहा जाता है कि यहां बद्री ( बेर ) के घने वन होने के कारण इस क्षेत्र का नाम बद्री वन पड़ा । बाद मे आदि शंकराचार्यजी के समय इस स्थल का नाम बद्रीनाथ पड़ा। बताया जाता है कि यहां व्यास मुनि का आश्रम था । पुराणों में बद्रीनाथ को सबसे प्राचीन क्षेत्र बताया गया है । इसकी स्थापना सतयुग मे हुई थी । कहा जाता है कि नर और नारायण नामक दो ऋषि थे । उन्हें भगवान विष्णु का चौथा अवतार कहा जाता है । उन दोनो ने बद्रिकाश्रम में कठोर तपस्या की थी । उनकी तपस्या से इंद्र का सिंहासन डोल गया । तब इन्द्र ने उन दोनो ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिए इंद्रलोक की कुछ अप्सराएं भेजी । इससे नारायण ऋषि को बहुत क्रोध आया । उन्होंने इंद्र को श्राप देना चाहा , किन्तु नर ऋषि ने उन्हें शांत कर दिया । तब इन्द्र को सीख देने के लिए नारायण ऋषि ने इंद्र द्वारा भेजी गई सभी अप्सराओं से सुंदर एक अप्सरा का नि...

Varah Caves - Tamilnadu

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 वराह गुफा मंदिर - तमिलनाडु तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले मे बंगाल कि खाड़ी के कोरोमंडल तट पर मामल्लपुरम में स्थित एक प्राचीन गुफा मंदिर है। यह मंदिर चट्टान को काटकर बनाया गया है । यह मंदिर पहाड़ी चोटी पर स्थित गांव का एक हिस्सा है , जो महाबलीपुरम से 4 km ( 2.5 मील ) उत्तर में स्थित है । यह प्राचीन मंदिर सातवीं सदी के अंत से भारतीय रॉक कट वास्तुकला का एक अप्रतिम उदाहरण है । इस मंदिर के ऐतिहासिक परिदृश्य और खूबसूरती को देखते हुए इसे 1984  मे UNESCO द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया जा चुका है । भगवान विष्णु की प्रतिमा इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है । वराह अवतार में भगवान विष्णु कि यह मूर्ति एक पौराणिक कथा को चित्रित करती है जब धरती माता को बचाने के लिए श्री विष्णु ने वराह अर्थात सूअर ( कूर्म ) का रूप धारण किया था । पौराणिक कथा के अनुसार जब हिरण्याक्ष ने धरती माता को कष्ट पहुंचाया तब मां वसुंधरा जल में डूब गई थी । तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर राक्षस को मारकर अपने दांतों के सहारे धरती माता की रक्षा की । गुफा में सबसे प्रमुख मूर्ति हिंदू भगवान विष्णु की है, जो वराह या सूअर के अवत...

Sringeri - Karnataka

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 Sringeri - Karnataka  श्रृंगेरी शारदा पीठ कर्नाटक राज्य के चिकमगलूर जिले में तुंगा नदी के तट पर स्थित है । यह शारदा पीठ आदी गुरु  शंकराचार्य द्वारा ईसवी सन् 725 मे भारतवर्ष मे स्थापित हिन्दू धर्म के चार पीठों मे से एक दक्षिण पीठ है । यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी के ऊपर स्थित है जहां लगभग 170 सीढ़िया पार कर पहुंचा जा सकता है । यह मंदिर तुंगा नदी के पार नरसिंह वन मे स्थित है । यह शहर श्री शारदम्बा , श्री विद्याशंकर, श्री मलहनीकरेश्वर और अन्य देवताओं के मंदिरों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। श्रृंगेरी नाम ऋष्यश्रृंग-गिरि से लिया गया है, जो पास की एक पहाड़ी है जिसके बारे में माना जाता है कि इसमें ऋषि विभांडक और उनके पुत्र ऋष्यश्रृंग का आश्रम था। रामायण के बाल-कांड के एक प्रसंग में , वशिष्ठ बताते हैं कि कैसे ऋष्यश्रृंग ने रोमपद के सूखे से त्रस्त राज्य में बारिश लाई। श्री आदि शंकराचार्य ने अपने शिष्यों को रहने और शिक्षा देने के लिए इस स्थान को चुना था, क्योंकि जब वे तुंगा नदी के किनारे टहल रहे थे, तो उन्होंने एक फन उठाए हुए नाग को देखा, जो प्रसव पीड़ा से गुज...

Hawa Mahal Jaipur Rajasthan

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 Hawa Mahal - Jaipur Rajasthan  भारत के राजस्थान के पिंक सिटी जयपुर मे स्थित हवा महल प्राचीन भारतीय नक्काशी का एक अप्रतिम उदाहरण है । हवा महल को शहर के सबसे प्रसिद्ध स्मारकों मे से एक माना जाता है । हवा महल का निर्माण 1799 मे जयपुर के कछवाहा शासक महाराज सवाई प्रताप सिंह ने रॉयल सिटी पैलेस के विस्तार के रूप मे करवाया था । हवा महल का डिजाइन कृष्ण के मुकुट के आधार पर लाल चंद उस्ताद ने तैयार किया था । राजस्थान का यह प्रसिद्ध महल राजस्थान की राजधानी के केंद्र में स्थित है। जयपुर के "गुलाबी शहर" की दृश्य भाषा को ध्यान में रखते हुए, हवा महल पूरी तरह से लाल बलुआ पत्थर से बना है , जो सूरज की रोशनी में गुलाबी रंग के साथ चमकता है। इसे बिना नींव के निर्मित दुनिया की सबसे ऊंची इमारत के रूप में पहचाना जाता है। हवा महल को एक पर्दे के रूप में बनाया गया था। इस वास्तुशिल्प पर्दे के माध्यम से शाही घराने की महिलाएँ जो घूंघट प्रथा का सम्मान करते हुए त्यौहार और अन्य उत्सवों को इन नक्काशीदार खिड़कियों से स्वतंत्र रूप से देख सकती थीं । इसका अग्रभाग, जो 50 फीट (15 मीटर) ऊंचा है, जिनमे 953 खिड़कियां ह...

Ranakpur Jain Temple - Rajasthan Jodhpur

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 रणकपुर जैन मंदिर  - राजस्थान जोधपुर  राजस्थान के पाली जिले के अंतर्गत सादड़ी शहर के निकट ही रणकपुर गाँव है जो भारत की अप्रतीम वास्तुकला को समेटे हुए है । रणकपुर गांव दो बड़े पर्यटक स्थल - जोधपुर और उदयपुर के बीच स्थित है । रणकपुर जैन मंदिर या चतुर्मुख धारणा विहार एक प्राचीन श्वेतांबर जैन मंदिर है । यह मंदिर जैन संस्कृति के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण मंदिरों मे से एक है । इस मंदिर का निर्माण 15वि शताब्दी मे हुआ था । पाली जिले के अरावली पर्वत की घाटियों मे स्तिथ यह ऋषभदेव का चतुर्मुखी जैन मंदिर है जो चारों ओर जंगल से घिरा हुआ है। 1446 विक्रम सम्वतः मे इस मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ जो 50 से अधिक वर्षों तक चला । मंदिर में 4 प्रवेश द्वार है  , 1444 खंबे , 29 हाल , 80 गुम्बद और 426 स्तंभ है । मंदिर के मुख्य गृह में तीर्थकर आदिनाथ की संगमरमर की चार विशाल मूर्तियां है   जो चार अलग दिशाओं की ओर उन्मुख है । इसी कारण से इसे चतुर्मुख मंदिर कहा जाता है । मंदिर मे 76 छोटे गुंबदनुमा पवित्र स्थान , 4 बड़े प्रार्थना कक्ष तथा 4 बड़े पूजन स्थल है । ये मनुष्य को जीवन मृत...

Pashupati Nath - Nepal India

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 पाशुपतिनाथ मंदिर -  नेपाल नेपाल की राजधानी काठमांडू से 3 km उत्तर - पश्चिम में बागमती नदी के किनारे देवीपाटन गांव मे स्तिथ एक हिंदू मंदिर है जो पाशुपतिनाथ मंदिर के नाम से  भगवान शिव का सबसे प्रसिद्ध मंदिर माना जाता है । किंवदंतियों के अनुसार- इस मंदिर का निर्माण “सोमदेव राजवंश” के पशु-प्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा. पूर्व में कराया था । इस मंदिर के जैसे अन्य मंदिरों का भी निर्माण हुआ हैं जिनमें भक्तपुर 1480 ललितपुर 1566 और बनारस (19वीं शताब्दी के प्रारंभ में) शामिल हैं। मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ था इसका पुनः निर्माण “राजा नरेश भूपतेंद्र मल्ल” ने 1697 में करवाया था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है जो पशुपति के रूप मे जानवरों के रक्षक है। यह एक सनातनी मंदिर हैं जो नेपाल की राजधानी काठमांडू से 3कि.मी उत्तर-पश्चिम में बागमती नदी के किनारे देवपाटन गाँव में स्थित शिव को समर्पित शिवालय हैं।  यह मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता हैं । 15वीं शताब्दी के राजा “प्रताप मल्ल” से शुरु हुई एक परंपरा हैं कि मंदिर में चार पुजारी (भट्ट) और एक मुख्य पुजारी (मूल-भट्ट) दक्षिण...

Dilwada Mandir Rajasthan / दिलवाड़ा मंदिर राजस्थान

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 Dilwada Mandir Rajasthan Jodhpur/ दिलवाड़ा मंदिर राजस्थान जोधपुर   दिलवाड़ा मंदिर राजस्थान के जोधपुर के निकट सिरोही जिले के माउंट आबू नगर में स्थित है, यह पांच मंदिरों का समूह है । यह मंदिर श्वेतांबर जैन धर्म के तीर्थकरों को समर्पित है । दिलवाड़ा मे सर्वाधिक प्राचीन " विमलशाही मंदिर " जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर को समर्पित है जो 1031 ई० मे बनवाया गया था । " लुन वसाही मंदिर " बाइसवे तीर्थकर नेमीनाथ को समर्पित प्रसिद्ध मंदिर है । यह मंदिर 1231 ई० मे वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाइयों द्वारा बनवाया गया था । परिसर मे पांचवा मंदिर संगमरमर का है । दिलवाड़ा के मंदिर और मूर्तियां मंदिर निर्माण कला का अप्रतिम उदाहरण है । मंदिरों के लगभग 48 स्तंभों में नृत्यांगनाओं कि आकृतियां बनी हुई है । इस मंदिर में आदिनाथ की मूर्ति की आंखें असली हीरे की बनी है तथा गले में बहुमूल्य रत्न आभूषण है। इन मंदिरों में हिंदू देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। एक उत्कृष्ट प्रवेश द्वार है।  विमलशाही मंदिर सफेद संगमरमर से पूर्ण रूप से तराशा गया यह मंदिर गुजरात के चालुक्य राजा भीम प्रथम के मं...

Mondhera Sun Temple - Gujrat

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 Mondhera Sun Temple - Gujrat  मोंढेरा सूर्य मंदिर - गुजरात  भारत में गुजरात के मेहसाना जिले के " मोंढेरा " गांव में पुष्पा वती नदी के किनारे " मोंढेरा सूर्य मंदिर " स्थित है । यह मंदिर गुजरात के पाटन से 30 km की दूरी पर स्थित है । इस मंदिर का निर्माण सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम द्वारा सन् 1026 - 1027 ई० मे करवाया गया था । मंदिर परिसर के मुख्य तीन भाग है - 1- गूढ़मण्डप ( मुख्य मंदिर ) 2- सभामंडप  3- कुण्ड ( जलाशय ) मोंढेरा सूर्य मंदिर सूर्यदेव के प्रसिद्ध मंदिरों मे से एक है । गूढ़मण्डप ( मुख्य मंदिर ) , चालुक्य वंश के राजा भीमदेव प्रथम के शासनकाल के दौरान बनाया गया है । मन्दिर के स्तंभों पर अत्यंत ही सुंदर नक्काशी की गई है । परिसर की पश्चिम दीवार पर देवनागिरी लिपि मे " विक्रम सम्वतः 1083 " का एक उल्टा लिखा हुआ शिलालेख है जो 1026 - 1027 CE के अनुरूप है । यह शिलालेख मंदिर के विनाश और पुनःनिर्माण का प्रमाण देता है । प्राप्त शिलालेख को निर्माण के बजाय गजनी द्वारा विनाश की तारीख माना जाता है । 1024-25 मे गजनी के मेहमूद ने राजा भीमदेव के राज्य पर आक्रमण किय...

Chausath Yogini Mandir - Madhya Pradesh

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 Chausath Yogini Mandir / चौसठ योगिनी मंदिर  मध्य प्रदेश के मुरैना जिले मे मितावली नामक जगह पर स्थित एक प्राचीन मंदिर है जो चौसठ योगिनी मंदिर के नाम से विख्यात है यह मंदिर ग्वालियर शहर से लगभग 30 km की दूरी पर स्थित है । मुरैना में स्थित यह मंदिर तंत्र-मंत्र के लिए दुनियाभर में जाना जाता था। इस रहस्यमयी मंदिर को तांत्रिक यूनिवर्सिटी भी कहते थे। यहां पर दुनियाभर से लाखों तांत्रिक तंत्र-मंत्र की विद्या सीखने के लिए आते थे। इस मंदिर का आकार वृत्ताकार है जिसमे 64 कक्ष है । इसके मध्य मे एक खुला हुआ मंडप है । हमारे भारत का संसद भवन भी इसी मंदिर की शैली का प्रेरणास्त्रोत है । विक्रम संवत 1383 के एक शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण कच्छपघाट राजा देवपाल  ( 1055 - 1075 ) मे करवाया गया था । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1951 मे दिनांक 28/11/1951 में इस  मंदिर को एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। चौसठ योगिनी मंदिर, मुरैना, जिसे एकत्तरसो महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, लगभग सौ फीट ऊंची एक अलग पहाड़ी पर स्थित, यह गोलाकार मंदिर नीचे की ओर खेती किए गए खेतों का शा...

Lotus Temple Delhi/ कमल मंदिर दिल्ली

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 कमल मंदिर नई दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली के बहापुर गाँव में स्थित है। इस मंदिर का उद्घाटन 24 दिसंबर , 1986 को हुआ । आम जनता के लिए यह मंदिर 1 जनवरी 1987 को खोला गया। कमल मंदिर, दिल्ली के नेहरू पैलेस (कालकाजी मंदिर) के पास स्थित एक बहाई ( ईरानी धर्मसंस्थापक बहाउल्लाह के अनुयायी ) उपासना स्थल है। यह अपने आप में एक अनूठा मंदिर है। यहाँ न कोई मूर्ति है और न ही किसी प्रकार का कोई धार्मिक कर्म-कांड किया जाता है , यहाँ पर विभिन्न धर्मों से संबंधित पवित्र लेख पढ़े जाते हैं। भारत के लोगों के लिए कमल का फूल पवित्रता तथा शांति का प्रतीक होने के साथ ईश्वर के अवतार का संकेत चिह्न भी है। यह फूल कीचड़ में खिलने के बाद भी पवित्रता का मर्म समझाता है, तथा स्वच्छ रहना भी सिखाता है ।इसकी कमल सदृश आकृति के कारण इसे कमल मंदिर या ( Lotus temple ) टेंपल के नाम से ही पुकारा जाता है। इसका मुख्य नाम बहाई मंदिर है । बहाई उपासना मंदिर उन मंदिरों में से एक है जो गौरव, शांति एवं उत्कृष्ठ वातावरण को ज्योतिर्मय करता है, जो किसी भी श्रद्धालु को आध्यात्मिक रूप से प्रोत्साहित करने के लिए अति आवश्यक है।...

Padmnabh Swami Mandir - Thiruvananthapuram

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 Padmnabh Swami Mandir - Thiruvanthampuram भारत के केरल राज्य के तिरुवनन्तपुरम मे स्तिथ भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर पद्मनाभस्वामी मंदिर एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों मे से एक है । इस मंदिर का निर्माण ( 1733 ई ) राजा मार्तंड द्वारा करवाया गया था । यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है । पद्मनाभ स्वामी मंदिर के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी है । मान्यता है कि सबसे पहले इस स्थान से भगवान विष्णु की एक प्रतिमा प्राप्त हुईं थी जिसके बाद उसी स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करवाया गया है । मंदिर के गर्भगृह मे भगवान विष्णु शेषनाग पर शयनमुद्रा मे विराजमान है । इस विश्राम अवस्था को " पद्मनाभ " कहा जाता है जिसके कारण यह मंदिर पद्मनाभ स्वामी मंदिर के नाम से विश्व भर मे विख्यात है । तिरुवनन्तपुरम नाम भगवान के " अनंत " नामक नाग के नाम पर ही रखा गया है । मंदिर के एक ओर समुद्र तट है तथा दूसरी ओर पश्चिमी घाट मे पहाड़ियों का अद्भुत सौंदर्य देखने को मिलता है । माना जाता है की मंदिर ऐसे स्थान पर स्थित है जो सात परशुराम क्षेत्रों में से एक है । स्कंद पुराण और पद्म पुराण ...

Mahendra Caves - Pokhra Nepal

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 Mahendra Caves - Pokhra Nepal  महेंद्र गुफ़ा एक विशाल चुना पत्थर की गुफा है, जो पोखरा  - 16 बटुलेचौर , के कास्की जिले में स्थित है । यह प्राचीन गुफा नेपाल के पश्चिमी क्षेत्र के पोखरा शहर में स्थित है । यह गुफा समुद्र तल से लगभग 1100 m ऊपर है । इस गुफा मन्दिर की खोज 1950 के दशक मे पोखरा के चरवाहों ने की थी । इस गुफा का निर्माण युवा ( प्लिस्टोसिन ) चुना पत्थर से हुआ है । इस गुफा का प्राचीन नाम - " अधेरो भवन " था , जिसका शाब्दिक अर्थ है - अंधकारमय निवास स्थान । इस गुफा का नाम देश के तत्कालीन शासक स्वर्गीय राजा महेंद्र बीर विक्रम शाह देव के नाम पर पड़ा  । महेंद्र गुफ़ा भगवान शिव को समर्पित है । इस गुफा मे एक छोटा मंदिर है , जहा एक शिवलिंग , सिद्धिविनायक  और एक गाय की मूर्ति स्थापित है । महेंद्र गुफ़ा के निकट दो अन्य गुफाएं भी है ।  1 - कुमारी गुफा  2 - चमगादड़ गुफा ।

Rani ki Vav - Gujrat

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 Rani ki vav - Gujrat  रानी की वाव भारत के गुजरात राज्य के पाटण में स्थित एक प्रसिद्ध बावड़ी ( सीढ़ीदार कुआँ ) है। पाटण को पहले 'अन्हिलपुर' के नाम से जाना जाता था , जो गुजरात की पूर्व राजधानी हुआ करती थी। रानी की वाव ( बावड़ी ) वर्ष 1063 में सोलंकी शासन के राजा भीमदेव प्रथम के प्रेम  में उनकी पत्नी रानी उदयामति ने बनवाया था। सरस्वती नदी के तट पर बनी ये 7 तलों की वाव 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी है। इस वाव में 30 किमी लंबी रहस्यमयी सुरंग भी है, जो पाटण के सिद्धपुर में जाकर निकलती है। ऐतिहासिक बावड़ी की  कलाकृति की खूबसूरती यहां आने वाले पर्यटकों का दिल खुश कर देती है, तथा भारत के प्राचीन इतिहास से उनका परिचय भी कराती है।  रानी उदयमति जूनागढ़ के चूड़ासमा शासक रंखेंगार (खंगार) की पुत्री थीं जो सोलंकी राजवंश के संस्‍थापक  थे। सीढ़ी युक्‍त बावड़ी में कभी सरस्वती नदी के जल के कारण गाद भर गया था । वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि अवतार आदि के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। रानी की वाव च...

Amrawati Stupa - Andhra Pradesh

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 अमरावती  स्तूप - आंध्र प्रदेश    अमरावती स्तूप आंध्र प्रदेश की राजधानी गुंटूर मे है। इसका प्राचीन नाम धन्यकतक है । अमरावती स्तूप भारत के पालनाडू जिले के अमरावती गांव मे स्तिथ एक बौद्ध स्मारक है । यह स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण मे है। अमरावती में बौद्ध स्तूप की खोज 1797 मे कर्नल मैकेंजी ने की थी। अमरावती स्तूप गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है इस स्तूप का निर्माण लगभग 1900 साल पहले सतवाहनों द्वारा करवाया गया था। ये बौद्ध धर्म के अनुनायियों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्मारक है । अमरावती की मूर्तियां भारत और विदेशों के कई संग्रहालयों में है जिनमे से काफी मूर्तियां क्षतिग्रस्त है । अमरावती स्तूप घंटाकृत में बना है , इस स्तूप मे संगमरमर का प्रयोग हुआ है । अमरावती में ठोस मिट्टी के टीले को जोड़कर स्तूप को बड़ा किया गया जिसमे स्तूप के चारों ओर रेलिंग ( वेदिका ) और नक्काशीदार स्लैब शामिल है । इन्हे ड्रम स्लैब भी कहते है , क्योंकि इन्हे स्तूप के उर्धवधर निचले हिस्से ड्रम ( थोलोबेट ) के चारों ओर रखा जाता था । प्रारंभिक काल ( 200-100 ईसा पूर्व ) म...

Hampi temples of Kernataka

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 Hampi Kerantantka  हम्पी मध्य कर्नाटक के पूर्वी भाग में आंध्र प्रदेश के साथ राज्य की सीमा के पास तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित है । यहां कुल 20 मंदिरों का समूह है । यह मंदिर शिव के एक रूप भगवान विरुपाक्ष को समर्पित है ।हम्पी कर्नाटक का एक गांव है जो अपने प्राचीन मंदिरों के लिए विश्वप्रसिद्ध है । हंपी को सन् 1986 में यूनेस्को द्वारा विश्व पुरातत्व स्थल घोषित किया गया। यह मंदिर बादामी और एहोल पुरातात्विक स्थलों से 140 किलोमीटर (87 मील) दक्षिण-पूर्व में है ।  हम्पी - जिसे पारंपरिक रूप से पम्पा-क्षेत्र , किष्किंधा-क्षेत्र या भास्कर-क्षेत्र के रूप में जाना जाता है , जो हिंदू धर्मशास्त्र में देवी पार्वती का दूसरा नाम है। इस प्राचीन नगर का उल्लेख रामायण और हिंदू धर्म के पुराणों में किया गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, युवती पार्वती (जो शिव की पिछली पत्नी सती का अवतार हैं) शिव से विवाह करने का संकल्प लेती हैं । शिव दुनिया से बेखबर योग ध्यान में खोए हुए हैं; पार्वती ने उन्हें जगाने और उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए देवताओं से मदद लेती है । इंद्र ने शिव को ध्यान से जगाने के लिए का...

Ellora Caves Maharashtra

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 एलोरा Caves - Maharashtra , Aurangabad  काल - 600 - 1000 ई० एलोरा भारतीय पाषाण शिल्प स्थापत्य कला का सार है, यहाँ 34 "गुफ़ाएँ" हैं जो एक ऊर्ध्वाधर खड़ी सहाद्री पर्वत का एक फ़लक है। इसमें हिन्दू, बौद्ध और जैन गुफा मन्दिर बने हैं। ये मंदिर पाँचवीं और दसवीं शताब्दी में बने थे। यहाँ 12 बौद्ध गुफाएँ (1-12), 17 हिन्दू गुफाएँ (13-29) और 5 जैन गुफाएँ (30-34) हैं। ये सभी आस-पास बनीं हैं और अपने निर्माण काल की धार्मिक सौहार्द को दर्शाती हैं। इन्हें ऊँची बेसाल्ट की खड़ी चट्टानों की दीवारों को काट कर बनाया गया हैं। यह मंदिर केवल एक खंड को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। एलोरा का प्राचीन नाम एलापुर अंचल था । इसका निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ( 756 - 72 ) के द्वारा करवाया गया । एलोरा का केंद्रीय स्थल इसका मुख्य मंदिर कैलाश मंदिर है । मन्दिर मे सर्वाधिक चित्र छतों व दीवारों पर बने हैं । मंदिर का शिखर 95 ft ऊंचा 4 मंजिला है । इस मंदिर से दक्कन शैली को प्रेरणा मिली । इस मंदिर योजना शैली मे पदत्तकल स्थित विरूपक्ष मन्दिर शैली का अनुकरण किया । कैलाश मंदिर ...